किसी भी व्यक्ति या पाठ को अध्ययन का विषय बनाने का मतलब है उसकी आलोचनात्मक पड़ताल। पढ़ाने का मतलब प्रचार नहीं है। धर्म के अध्ययन को लेकर संकट पैदा होता है क्योंकि धार्मिक लोग धर्म को आलोचना नहीं आस्था का विषय मानते हैं। पर श्रद्धा,आवेश से मुक्त होना कक्षा में प्रवेश की पहली शर्त है।
Delhi University- Faculty of Arts: जैसे ही आर्ट्स फैकल्टी की इमारत में घुसा, नोटिस बोर्ड पर लगे एक पर्चे ने ध्यान खींचा: ‘सेव एकडेमिक स्पेस ऑफ भारत’। ‘भारत’ के एकडेमिक स्पेस को ख़तरा है, यह जानकर कौतूहल हुआ। इसलिए कि लगा था कि 10 सालों में हर ‘स्पेस’ का भारतीयकरण किया जा चुका है और हर जगह संरक्षित की जा चुकी है। फिर कौन सी जगह रह गई जिसे बचाया जाना है? जानने की इच्छा हुई कि कौन यह आह्वान कर रहा है। बड़े–बड़े अक्षरों में संस्था का नाम लिखा था जिसने यह पर्चा जारी किया था: स्टूडेंट्स फॉर एकडेमिक जस्टिस (एसएजे)।
आज तक लोग ‘एकडेमिक फ्रीडम’ के लिए चिंतित थे। अब ‘एकडेमिक जस्टिस’ के लिए काम करने वाला नया समुदाय आ गया है। इससे ‘फ़्रीडम’ वालों को बल ही मिलेगा क्योंकि ‘फ्रीडम’ और ‘जस्टिस’ तो हमारे संविधान में साथ साथ ही आते हैं।
आह्वान और आह्वानकर्ता का नाम अंग्रेज़ी में देखकर तसल्ली हुई कि अंग्रेज़ी को अब भारतीय मान लिया गया है क्योंकि भारत में अकादमिक जगह को बचाने का आह्वान अंग्रेज़ी में किया जा रहा है और भारत–चिंता से उद्वेलित संस्था का नाम भी अंग्रेज़ी में है।
पर्चे का शीर्षक एक सवाल की शक्ल में था: पाठ्यक्रम सुधार या वामपंथी एजेंडा! विस्मयादिबोधक चिह्न देखकर लगा कि संस्था प्रश्न नहीं कर रही, हैरान है कि पाठ्यक्रम सुधार के नाम पर वामपंथी एजेंडा लागू किया जा रहा है। हैरानी की बात है भी क्योंकि पाठ्यक्रम– सुधार के नाम पर वामपंथी एजेंडा कैसे लागू किया जा सकता है जबकि भारत में हिंदुत्व–काल चल रहा है और हर चीज़ अब भारतीयतावादियों के हाथ में है।
लेकिन ऐसा लगता है कि आज भी भारत में वामपंथी प्रभावशाली बने हुए हैं। 10 सालों में उन्हें ख़त्म करना तो दूर, निष्प्रभावी भी नहीं किया जा सका है।
बहरहाल! पर्चे को पढ़ने पर मालूम हुआ कि इस ‘एकेडमिक स्पेस’ को ख़तरा इतिहास विभाग की तरफ़ से पैदा हुआ है। विभाग ने ‘मनुस्मृति’ और ‘बाबरनामा’ को स्नातक स्तर पर पाठ्य सामग्री के रूप में प्रस्तावित किया है। एसएजे को इन दोनों से एतराज है।
आश्चर्य इस बात पर होना चाहिए कि वामपंथियों ने ‘मनुस्मृति’ पढ़ने को क्यों कहा। कुछ वक्त पहले जब विधि विभाग ने ‘मनुस्मृति’ को पाठ्यक्रम में लगाया था तब वामपंथियों के एक हिस्से ने आपत्ति जताई थी। जो तर्क उनका था वही इस पर्चे को जारी करने वालों का है। यह ग्रंथ महिला विरोधी है, दलितों, पिछड़ों के ख़िलाफ़ है, संविधान के मूल्यों के विरुद्ध है। इसलिए इसे पढ़ने को नहीं कहा जाना चाहिए। कम से कम एक जगह वामपंथियों और राष्ट्रवादियों के विचार मिल रहे हैं।
लेकिन राष्ट्रवादी इसे वामपंथी चतुराई समझ रहे हैं। उनका कहना है कि असल में वामपंथी इसलिए मनुस्मृति पढ़ाना चाहते हैं ताकि मालूम हो कि जिसे हिंदू धर्म का मूल ग्रंथ माना जाता है,वह प्रतिगामी है, महिला, दलित विरोधी है, समानता के ख़िलाफ़ है। इस तरह वे हिंदू धर्म के ख़िलाफ़ विद्वेष फैलाना चाहते हैं।
बाबरनामा तो क़तई नहीं पढ़ाया जा सकता क्योंकि बाबर आक्रांता था, क्रूर था। एसएजे ने पूछा है कि क्या हमारे पास और महान चरित्र नहीं हैं जिन्हें पढ़ाया जाता? एसएजे की चिंता यह है कि हमारे विद्यार्थी कहीं बाबर को आदर्श व्यक्ति और मनुस्मृति को आदर्श ग्रंथ न मान बैठें। लेकिन वे इससे अधिक चिंतित हैं कि कहीं मनुस्मृति पढ़ने से हिंदू धर्म के बारे में ग़लत धारणा न बन जाए।
एसएजे कुछ भी सोचे और वामपंथी भी कुछ सोचें, हमें इस पर ज़रूर सोचना चाहिए कि हम कुछ भी विश्वविद्यालय में क्यों पढ़ते हैं। क्या हम ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ इसलिए पढ़ाते हैं कि विद्यार्थियों को कम्युनिस्ट बनाएं? या क्या ‘हिंद स्वराज’ पढ़ाकर विद्यार्थियों को गांधीवादी बनाना चाहते हैं? क्या हम सार्त्र पढ़ाकर किसी को अस्तित्ववादी बनने को कह रहे हैं? या सावरकर को पढ़ाकर क्या हिंदुत्ववादी प्रचार कर रहे हैं?
असल में किसी भी व्यक्ति या पाठ को अध्ययन का विषय बनाने का मतलब है उसकी आलोचनात्मक पड़ताल। पढ़ाने का मतलब प्रचार नहीं है। गांधी हों या मार्क्स या आंबेडकर या इक़बाल, रामचरित मानस हो या वेद, अगर वे पाठ्य विषय हैं तो उनका अध्ययन आलोचनात्मक तरीक़े से ही किया जाएगा। जैसे ही हम विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश करते हैं, पहला मंत्र, जो एक तरह से आख़िरी भी है, यही रहता है कि कुछ भी आलोचना के परे नहीं है। किसी भी पुस्तक या व्यक्ति का अध्ययन करने का अर्थ है उसका विश्लेषण करना, पूजा नहीं।
अध्यापक का कर्तव्य है कि वह विचारणीय विषय के सारे संदर्भों से विद्यार्थियों को परिचित कराए। मात्र ऐसे स्रोतों से नहीं जो उसके पक्ष में हों बल्कि वे भी जो उसकी आलोचनात्मक पड़ताल करते हैं। शिक्षा का सारा व्यापार एक तरह से आलोचक मस्तिष्क के निर्माण का व्यापार है।
विश्वविद्यालय कीर्तन की जगह नहीं, अध्ययन की जगह है।
इसीलिए धर्म के अध्ययन को लेकर संकट पैदा होता है क्योंकि धार्मिक लोग धर्म को आलोचना नहीं आस्था का विषय मानते हैं। भारत में जो लोग विश्वविद्यालयों में धर्म अध्ययन केंद्रों के न होने पर अफ़सोस जताते हैं, वे भूल जाते हैं कि श्रद्धा और आवेश, इन दो से मुक्त होना कक्षा में प्रवेश की पहली शर्त है।
जैसे ही हम किसी वस्तु को भावना का विषय मानते हैं, हम उसे कक्षा या पाठ्यक्रम से बाहर कर देते हैं। शायद इसीलिए गांधी ने धर्म को स्कूल से बाहर रखने की बात कही थी क्योंकि वे हमारी सीमा जानते थे। इसीलिए ‘मनुस्मृति’ पढ़ी और पढ़ाई जानी चाहिए। इससे मालूम होगा कि वह समाज कैसा था जिसने यह संहिता बनाई। फिर क्यों समय बदलने के बाद भी हिंदू समाज का एक हिस्सा इसे पवित्र मानता है? क्यों जनतांत्रिक क्रांतियों के दौर में भी एक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसे भारत का संविधान बनाना चाहता था? क्यों राजस्थान उच्च न्यायालय के बाहर आज भी मनु की मूर्ति लगी हुई है? इससे मनुस्मृति की समकालीनता का पता चलेगा।
प्रश्न यह है कि क्या इस तरह मनुस्मृति पढ़ाने की अनुमति होगी? क्या इसे इस प्रकार पढ़ाने वाले अध्यापक भी रह गए हैं?
पिछले 10 वर्षों में दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों ने जिस प्रकार के अध्यापकों की बहाली की है, उनके बारे में यह सुना जाता है कि उनकी पहली प्रतिबद्धता अपने विषय या विद्या से नहीं बल्कि आरएसएस से है। क्या वे इस ग्रंथ को या किसी भी ग्रंथ को आलोचनात्मक पद्धति से पढ़ाने को प्रस्तुत होंगे?
उसी तरह बाबर के बारे में अलग–अलग तरह के वृत्तांत हैं। जिस बाबर के नाम के बिना भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस का काम नहीं चलता, उसे जानना तो बहुत ज़रूरी है। लेकिन भाजपा के लोगों को भय है कि अगर बाबर के बारे में विद्यार्थी वास्तव में पढ़ना शुरू करेंगे तो बाबर का जो मिथ भाजपा या आरएसएस ने बना रखा है, वह टूट जाएगा। लेख ख़त्म करता उसके पहले ही खबर पढ़ी कि दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति ने साफ़ कर दिया है कि मनुस्मृति और बाबरनामा को पाठ्य सामग्री के तौर पर शामिल करने का सवाल ही नहीं है।
यह दिलचस्प है कि ऐसी घोषणा करते वक्त उन्होंने मनुस्मृति की आलोचना नहीं की लेकिन यह कहना ज़रूरी समझा कि बाबरनामा एक आक्रांता की आत्मकथा है, इसलिए आज उसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है। उन्होंने यही बात लेकिन मनुस्मृति के बारे में नहीं कही। क्या वह प्रासंगिक है लेकिन अभी राजनीतिक रूप से असुविधाजनक है, इसलिए उसे अभी नहीं पढ़ाया नहीं जा सकेगा?
अफ़सोस की बात यह है कि कुलपति ने ऐसी घोषणा करके विश्वविद्यालय की अकादमिक निर्णय लेने की प्रक्रिया को भी अप्रासंगिक कर दिया। पाठ्यक्रम संबंधी प्रस्ताव करने का अधिकार संबंधित विषय के विभाग का है। फिर उस पर कई चरणों में विचार विमर्श होता है और वह स्वीकार या अस्वीकार किया जाता है। उस प्रक्रिया के बाहर पाठ्यक्रम से संबंधित कोई भी निर्णय नहीं लिया जाना चाहिए।
कुलपति का दायित्व इस प्रक्रिया की गरिमा बनाए रखने का है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में प्रक्रिया, मर्यादा आदि शब्द ही धीरे–धीरे अप्रासंगिक होते गए हैं। लेकिन विश्वविद्यालय भी क्या विश्वविद्यालय रह गए हैं?
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